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भाग 1: भैरवपुर गांव का रहस्य – मौत की पहली दस्तक भैरवपुर... एक ऐसा गांव जिसका नाम सुनते ही आसपास के लोग रास्ता बदल लेते थे। कहते हैं कि गांव के बीचों-बीच एक पुरानी हवेली थी, जहां रात के बारह बजे किसी के रोने की आवाज़ गूंजती थी। जो भी उस आवाज़ का पीछा करता... वह कभी वापस नहीं लौटता। शहर का 26 साल का पत्रकार अर्जुन इन कहानियों को अंधविश्वास मानता था। सच जानने के लिए वह कैमरा लेकर भैरवपुर पहुंच गया। गांव में अजीब सन्नाटा था। शाम होते ही लोगों ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। एक बूढ़े आदमी ने अर्जुन को चेतावनी दी, "बेटा... आज अमावस्या है। अगर आधी रात के बाद हवेली से किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई दे... तो पीछे मुड़कर मत देखना।" अर्जुन हंस पड़ा। उसे लगा लोग बस डर फैला रहे हैं। रात के ठीक बारह बजे... हवेली के अंदर से धीमी सिसकियां सुनाई देने लगीं। अर्जुन ने कैमरा ऑन किया और आवाज़ का पीछा करते हुए हवेली के तहखाने तक पहुंच गया। तहखाने की दीवारों पर अजीब काले निशान बने थे। तभी उसे एक पुरानी डायरी मिली। उसमें लिखा था... "जिसने भी यह डायरी पढ़ी... अगली अमावस्या तक उसकी मौत तय है।" अर्जुन ने मुस्कुराकर डायरी बंद कर दी। लेकिन उसी पल... उसके कैमरे की स्क्रीन अपने आप चालू हो गई। स्क्रीन पर अर्जुन अकेला नहीं था। उसके बिल्कुल पीछे... सफेद साड़ी पहने एक औरत खड़ी थी। अर्जुन ने डरकर पीछे देखा... वहां कोई नहीं था। फिर कैमरे की स्क्रीन पर वही औरत धीरे-धीरे मुस्कुराने लगी... और अचानक कैमरा बंद हो गया। अगले ही पल हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया... और तहखाने से किसी ने फुसफुसाकर कहा— "अब तुम यहां से ज़िंदा नहीं जाओगे..." भाग 1 समाप्त...
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